रायपुर आंबेडकर अस्पताल में पर्ची के इंतजार में महिला की मौत, महासमुंद में भी मरीजों को लंबी लाइन की परेशानी
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| अस्पताल के पर्ची काउंटर पर मरीजों और परिजनों की लंबी कतार को दर्शाता सांकेतिक AI चित्र। |
छत्तीसगढ़,रायपुर,महासमुंद ।
छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रायपुर स्थित आंबेडकर अस्पताल (मेकाहारा) में इलाज से पहले पर्ची बनवाने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। उरला निवासी दुर्गेश साहू बुधवार को अपनी पत्नी अश्विनी बाई साहू को गंभीर हालत में अस्पताल लेकर पहुंचे थे। परिजनों के मुताबिक, अश्विनी सिकल सेल बीमारी से पीड़ित थीं और पिछले कुछ दिनों से उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही थी। शरीर पीला पड़ने और उल्टी की शिकायत के बाद उन्हें पहले सिकल सेल अस्पताल ले जाया गया, जहां से आंबेडकर अस्पताल रेफर किया गया जिसमे परिजनों द्वारा कहा जा रहा है की पर्ची प्रक्रिया में अधिक समय लग गया ।
छत्तीसगढ़ के सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल पर स्ट्रेचर भी उपलब्ध नही :–
परिजनों का आरोप है कि अस्पताल पहुंचने के बाद उन्हें पहले पर्ची बनवाने की प्रक्रिया पूरी करने को कहा गया। इस दौरान स्ट्रेचर भी उपलब्ध नहीं हुआ। अश्विनी को किसी तरह ऑटो से उतारकर हेल्प डेस्क के पास टेबल पर बैठाया गया। एक रिश्तेदार उन्हें संभालकर खड़ा रहा, जबकि उनकी दो साल की बच्ची भी वहीं रोती रही जो अपनी मां का तबियत देख कर बहुत रोने लगी।
30 मिनट की पर्ची काटने के लिए लंबा लाइन अंत में देरी के कारण मरीज की मौत :–
परिवार के अनुसार, करीब आधे घंटे तक कोई डॉक्टर या कर्मचारी महिला की गंभीर हालत देखने के लिए आगे नहीं आया। लगभग 11:18 बजे पर्ची बनने के बाद स्ट्रेचर मिला और महिला को वार्ड ले जाया गया, लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। इस घटना के बाद गंभीर मरीजों के लिए पर्ची और इलाज की प्राथमिकता को लेकर सवाल उठ रहे हैं की क्या गंभीर अवस्था में पर्ची कटवाना आवश्यक है ? यह सवाल सरकारी अस्पताल के स्वास्थ्य प्रकरण पर सीधा वार करता है की आखिर मरीज की जान से ज्यादा जरूरी औपचारिक पर्ची है!
आंबेडकर अस्पताल में स्ट्रेचर-व्हीलचेयर की कमी :–
अस्पताल में रोजाना बड़ी संख्या में मरीज ओपीडी, इमरजेंसी और अन्य विभागों में पहुंचते हैं। इसके बावजूद उपलब्ध स्ट्रेचर और व्हीलचेयर की संख्या जरूरत के मुकाबले कम बताई जा रही है। अस्पताल से मिली जानकारी के अनुसार करीब 70 स्ट्रेचर और 40 व्हीलचेयर उपलब्ध हैं। इनमें कुछ खराब भी पड़े रहते हैं और कुछ संसाधन दान से मिले हैं अब सोचने वाला बात यह है की छत्तीसगढ़ के सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल कहे जाने वाले आंबेडकर अस्पताल में क्या सिर्फ इतने कम स्ट्रेचर और व्हीलचेयर यह एक गंभीर मामला है जो मरीजों और उनके परिजनों के लिए बहुत आवशयक है।
इस मामले में अस्पताल अधीक्षक ने क्या कहा :–
प्राप्त जानकारी के अनुसार अस्पताल अधीक्षक डॉ. संतोष सोनकर के अनुसार, आपात स्थिति में आने वाले मरीजों का तत्काल इलाज करने के निर्देश दिए गए हैं। ऐसे मरीजों की पर्ची बाद में बनाई जानी चाहिए, उनका कहना है की इलाज में देरी का मुख्य कारण पहले सिकल सेल अस्पताल और बाद में सरकारी अस्पताल पहुंचना है।
महासमुंद सरकारी अस्पताल में भी लंबी पर्ची लाइन बनी परेशानी :–
रायपुर की घटना के बीच महासमुंद के सरकारी अस्पताल की पर्ची व्यवस्था भी चर्चा में आती है। यहां दूरदराज के गांवों से बड़ी संख्या में मरीज इलाज कराने पहुंचते हैं। कुछ मरीज ऑनलाइन पर्ची बनवा लेते हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले कई लोगों को ऑनलाइन प्रक्रिया की जानकारी नहीं होती। ऐसे मरीजों को अस्पताल पहुंचकर लंबी लाइन में लगना पड़ता है जिसके कारण उन्हें भीड़ में खड़ा होकर अधिक समय लगता है।
केवल हस्ताक्षर करवाने के लिए होती है बहस बाजी फिर स्टाफ नही काटते लाइन में लगने वाले की पर्ची :–
पुरानी पर्ची पर केवल हस्ताक्षर या जरूरी औपचारिकता पूरी कराने के लिए आने वाले मरीजों को भी कई बार इसी लाइन में लगना पड़ता है। इससे बुजुर्ग, ग्रामीण और गंभीर हालत वाले मरीजों को अतिरिक्त परेशानी होती है।
मरीजों की शिकायत यह भी है कि लाइन में किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा मदद किए जाने पर कुछ मामलों में पर्ची काउंटर पर विवाद की स्थिति बन जाती है और वह अपने पद का शक्ति दिखाकर मदद करने वाले की पर्ची ही नहीं काटते भले ही वो लाइन में ही लगा हो मतलब अगर कोई बीमार या बुजुर्ग सिर्फ हस्ताक्षर करवाने के लिए पुरानी पर्ची लाए तो उसकी मदद करने वाले भी खड़े रहे जिसके बाद उसके परिजनों का कहना है कि अस्पताल की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें नियमों का पालन भी हो और जरूरतमंद मरीजों को अनावश्यक परेशानी भी न उठानी पड़े मगर यहां सब कुछ अलग है ।
दवाई और पंजीयन की पर्ची एक ही काउंटर पर :–
कई लोगो का तो यह भी कहना है की हफ्ते में उपचार के लिए दवाई लेने का काउंटर अलग किया जाए क्योंकि पंजीयन काउंटर और रोज आने वाले मरीजों का काउंटर एक ही है जिससे भीड़ की स्तिथि और बढ़ जाती है क्युकी जो पहले साप्ताहिक उपचार के लिए दवाई दिया जाता था जो दोपहर के 2.00 बजे के बाद होता था परंतु अब इसका समय परिवर्तित कर दिया गया है जो सुबह के समय हो गया है जो मरीजों और साप्ताहिक उपचार दवाई एक ही काउंटर पर भीड़ का सामना कर रहे है ।
सवाल व्यवस्था का है, मरीजों का नहीं :–
रायपुर की घटना ने यह सवाल सामने रखा है कि गंभीर मरीज अस्पताल पहुंचने के बाद कागजी प्रक्रिया में कितनी देर तक इंतजार करें। वहीं महासमुंद जैसे जिला अस्पतालों में भी पर्ची व्यवस्था को सरल बनाने और ग्रामीण मरीजों के लिए सहायता उपलब्ध कराने की जरूरत महसूस होती है। ऑनलाइन व्यवस्था के साथ ऐसे मरीजों के लिए अलग सहायता काउंटर या त्वरित पर्ची सुविधा होने से लाइन का दबाव कम किया जा सकता है जिसमे मरीज के साथ साथ साप्ताहिक उपचार के लिए दवाई लेने वालो का समय और भी बीच सकता है एवं जल्द ही इलाज हो सकता है।
हॉस्पिटलों में मरीजों के लिए आपातकालीन व्यवस्था और भी प्रभावी बनाने की आवश्यकता :–
इलाज की व्यवस्था में पर्ची और औपचारिकताएं जरूरी हो सकती हैं, लेकिन गंभीर मरीजों के लिए समय सबसे महत्वपूर्ण होता है। रायपुर की घटना और महासमुंद की पर्ची व्यवस्था से जुड़ी शिकायतें अस्पतालों में मरीजों की सुविधा और आपातकालीन व्यवस्था को और प्रभावी बनाने की जरूरत दिखाती हैं जिससे सही समय पर मरीजों को स्वस्थ्य किया जा सकता है ।

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